1870 के दौरान अंग्रेज हुक्मरानों ने ‘गॉड सेव द क्वीन’ गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेजों के इस आदेश से बंकिम चंद्र चटर्जी को जो तब एक सरकारी अधिकारी थे, बहुत ठेस पहुंची और उन्होंने संभवत 1876 में इसके विकल्प के तौर पर संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण से एक नए गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया - ‘वंदे मातरम’। शुरुआत में इसके केवल दो पद रचे गए थे जो केवल संस्कृत में थे। इन दोनो पदों में केवल मातृ-भूमि की वन्दना थी। उन्हों ने १८८२ में जबआनन्द मठ नामक बांग्ला उपन्यास लिखा तब मातृभूमि के प्रेम से ओत-प्रोत इस गीत को भी उसमें शामिल किया। यह उपन्यास अंगरेजों के शासन तथा जमींदारों के शोषण के विरुद्ध जारी सन्यासी विद्रोह पर आधारित है। इसमें यह गीत सन्यासियों द्वारा ही गवाया गया है। इस उपन्यास में इस गीत के आगे के पद लिखे गए जो उपन्यास की भाषा अर्थात् बांग्ला में हैं। इन बाद वाले पदों में मातृभूमि की दुर्गा के रूप में स्तुति की गई है
राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकृति
स्वाधीनता संग्राम में निर्णायक भागीदारी के बावजूद जब राष्ट्र गान के चयन की बात आई तो ‘वंदे मातरम’ की जगह ‘जन गण मन अधिनायक जय हे’ को वरीयता दी गई। इसकी वजह यही थी कि कुछ मुसलमानों को ‘वंदे मातरम’ गाने पर आपत्ति थी, क्योंकि इस गाने में देवी दुर्गा को राष्ट्र के रूप में देखा गया है। इसके अलावा उनका मानना था कि यह गीत जिस ‘आनंद मठ’ उपन्यास से लिया गया है। वह मुसलमानों के खिलाफ लिखा गया है। इन आपत्तियों के मद्देनजर सन 1937 में कांग्रेस ने इस विवाद पर गहरा चिंतन किया। जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित समिति जिसमें मौलाना अब्दुल कलाम आजाद भी शामिल थे, ने पाया कि इस गीत के शुरूआती दो पद तो मातृभूमि की प्रशंसा में कहे गए हैं, लेकिन बाद के पदों में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र होने लगता है। इसलिए यह निर्णय लिया गया कि इस गीत के शुरूआती दो पदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में प्रयुक्त किया जाएगा। इस तरह ‘जन गण मन’ और ‘सारे जहां से अच्छा’ के साथ प्रारंभिक दो पदों का ‘वंदे मातरम’ गीत राष्ट्रगीत स्वीकृत हुआ।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद डा. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में २४ जनवरी १९५० में वन्दे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य पढ़ा जिसे स्वीकार कर लिया गया।
डा. राजेन्द्र प्रसाद का संविधान सभा को दिया गया वक्तव्य है।
शब्दों व संगीत कि वह रचना जिसे जन गण मन से संबोधित करा जाता है भारत का राष्ट्रगान है,बदलाव के ऐसे विषय अवसर आने पर सरकार आधिकृत करे, और वन्दे मातरम् गान, जिसने कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले (हर्षध्वनि) मै आशा करता हूँ कि यह सदस्यों को सन्तुष्ट करेगा। (भारतीय संविधान परिषद, खंड द्वादश:, २४-१-१९५०)
सर्वप्रथम १८८२ में प्रकाशित इस गीत पहले पहल ७ सितम्बर १९०५ में कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। इसीलिए २००५ में इसके सौ साल पूरे होने के उपलक्ष में १ साल के समारोह का आयोजन किया गया। ७ सितम्बर २००६ में इस समारोह के समापन के अवसर पर मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को स्कूलों में गाए जाने पर बल दिया। हालांकि इसका विरोध होने पर उस समय के मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने संसद में कहा कि गीत गाना किसी के लिए आवश्यक नहीं किया गया है, यह स्वेच्छा पर निर्भर करता
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भूमिका
बंगाल में चले आजादी के आंदोलन में विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाने लगा। धीरे-धीरे यह गीत लोगों में लोकप्रिय हो गया। ब्रितानी हुकूमत इसकी लोकप्रियता से सशंकित हो उठी और उसने इस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करना शुरु कर दिया। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने यह गीत गाया। पांच साल बाद यानी 1901 में कलकत्ता में हुए एक अन्य अधिवेशन में श्री चरन दास ने यह गीत पुनः गाया। 1905 में बनारस में हुए अधिवेशन में इस गीत को सरला देवी चौधरानी ने स्वर दिया।
कांग्रेस के अधिवेशनों के अलावा भी आजादी के आंदोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफी उदाहरण मौजूद हैं। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस जर्नल का प्रकाशन शुरू किया उसका नाम ‘वंदे मातरम’ रखा। अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़नेवाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हजारा की जुबान पर आखिरी शब्द ‘वंदे मातरम’ ही थे। सन 1907 में मैडम भीखाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टटगार्ट में तिरंगा फहराया तो उसके मध्य में ‘वंदे मातरम’ ही लिखा हुआ था।
गीत
बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा संस्कृत बांग्ला मिश्रित भाषा में रचित इस गीत का प्रकाशन 1882 में उनके उपन्यास ‘आनंद मठ’ में अंतर्निहित गीत के रूप में हुआ।[३] [[इस उपन्यास में यह गीत कुछ संन्यासीयों द्वारा गाया गया है । इसकी धुन जदुनाथ भट्टाचार्य ने बनाई है।
२००३ में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण मे जिसमे अब तक के दस सबसे मशहूर गानो का चयन करने के लिए दुनिया भर से लगभग ७,००० गीतों को चुना गया था, और बीबीसी के अनुसार, १५५ देशों/द्वीप के लोगों ने इसमे मतदान किया था, वंदे मातरम् शीर्ष के १० गानो में दूसरे स्थान पर था।
इसका शीर्षक बन्देमातरम् होना चाहिये वन्देमातरम् नहीं। हिन्दी व संस्कृत भाषा में हंलाकि वन्दे सही है,लेकिन यह गीत मूलरुप में बंग्ला लिपि में लिपिबद्ध किया गया था। बग्ला लिपि में "व" अक्षर है ही नहीं। अतएव बन्देमातरम शीर्षक से ही बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने इसे लिखा था। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुये कृपया शीर्षक "बन्देमातरम् या Bandemataram" कीजिये।
(संस्कृत मूल गीत)
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
सस्य श्यामलां मातरंम् .
शुभ्र ज्योत्सनाम् पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम् .
सुखदां वरदां मातरम् ॥
कोटि कोटि कन्ठ कलकल निनाद कराले
द्विसप्त कोटि भुजैर्ध्रत खरकरवाले
के बोले मा तुमी अबले
बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम् ॥
तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि ह्रदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे ॥
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् ॥
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
धरणीं भरणीं मातरम् ॥
(बंगला मूल गीत) সুজলাং সুফলাং মলয়জশীতলাম্ শস্যশ্যামলাং মাতরম্॥ শুভ্রজ্যোত্স্না পুলকিতযামিনীম্ পুল্লকুসুমিত দ্রুমদলশোভিনীম্ সুহাসিনীং সুমধুর ভাষিণীম্ সুখদাং বরদাং মাতরম্॥ কোটি কোটি কণ্ঠ কলকলনিনাদ করালে কোটি কোটি ভুজৈর্ধৃতখরকরবালে কে বলে মা তুমি অবলে বহুবলধারিণীং নমামি তারিণীম্ রিপুদলবারিণীং মাতরম্॥ তুমি বিদ্যা তুমি ধর্ম, তুমি হৃদি তুমি মর্ম ত্বং হি প্রাণ শরীরে বাহুতে তুমি মা শক্তি হৃদয়ে তুমি মা ভক্তি তোমারৈ প্রতিমা গড়ি মন্দিরে মন্দিরে॥ ত্বং হি দুর্গা দশপ্রহরণধারিণী কমলা কমলদল বিহারিণী বাণী বিদ্যাদায়িনী ত্বাম্ নমামি কমলাং অমলাং অতুলাম্ সুজলাং সুফলাং মাতরম্॥ শ্যামলাং সরলাং সুস্মিতাং ভূষিতাম্ ধরণীং ভরণীং মাতরম্॥ |


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